सीमा ने साबित किया- हौसले हों तो हर सपना होता है पूरा, कॉमनवेल्थ में जीता पदक
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की स्टार एथलीट सीमा कालीरामना ने महिला चक्का फेंक (डिस्कस थ्रो) स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया है। हालांकि, यह उपलब्धि केवल 58.65 मीटर के एक बेहतरीन थ्रो की कहानी नहीं है, बल्कि इसके पीछे मातृत्व सुख के बाद खेल के मैदान पर धमाकेदार वापसी, उच्च शिक्षा और खेलों के बीच बेहतरीन तालमेल, तथा अनगिनत संघर्षों के बीच कभी हार न मानने वाले जज्बे की अनकही दास्तान छिपी है।
रोमांचक मुकाबले में मिला पदक
ग्लासगो के मैदान पर जब सीमा का मुकाबला समाप्त हुआ, तब उनके स्कोर बोर्ड पर 58.65 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो दर्ज था। इसके बाद उनके लगातार तीन प्रयास फाउल हो गए, जिससे उनकी धड़कनें बढ़ गईं। उस वक्त उनकी नजरें पूरी तरह प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर टिकी थीं। कैमरून की एथलीट मोनी नोरा अटिम यदि अपने आखिरी प्रयास में 58.65 मीटर की दूरी पार कर लेतीं, तो सीमा के हाथ से यह पदक छिन सकता था। लेकिन किस्मत ने साथ दिया और जैसे ही अटिम का अंतिम प्रयास असफल घोषित हुआ, सीमा के चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान तैर गई। वर्षों की कड़ी मेहनत और पसीना आखिरकार कॉमनवेल्थ गेम्स के कांस्य पदक में तब्दील हो चुका था।
मां बनने के बाद भी नहीं टूटने दिए सपने
हरियाणा के भिवानी जिले की रहने वाली 27 वर्षीय सीमा कालीरामना की यह वापसी भारतीय एथलेटिक्स इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में शुमार हो चुकी है। वह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की बेहतरीन एथलीट ही नहीं हैं, बल्कि भिवानी स्थित चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय से फिजिकल एजुकेशन (शारीरिक शिक्षा) में पीएचडी की पढ़ाई भी कर रही हैं।
इसी सफर के दौरान उनकी जिंदगी में एक नया पड़ाव आया और वह बेटे रुद्र की मां बनीं। अमूमन कई महिला खिलाड़ियों के लिए मातृत्व (मदरहुड) के बाद खेल जगत में वापसी करना बेहद कठिन होता है, लेकिन सीमा ने विपरीत परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके। उन्होंने अपने बेटे के जन्म के महज 11 महीने के भीतर ही दोबारा अपना प्रतिस्पर्धी प्रशिक्षण शुरू कर दिया। गर्भावस्था के बाद शरीर को वापस उसी शारीरिक ताकत, फॉर्म और तकनीकी दक्षता में ढालना लोहे के चने चबाने जैसा था, लेकिन उन्होंने अटूट इच्छाशक्ति से यह कर दिखाया।
पति बने मार्गदर्शक और कोच
सीमा के इस संघर्षपूर्ण सफर में उनके पति रविंद्र (मोनू कालीरामना) ने एक मजबूत स्तंभ की भूमिका निभाई। खुद पूर्व राष्ट्रीय स्तर के चक्का फेंक खिलाड़ी रहे रविंद्र आज उनके मुख्य कोच की भूमिका भी निभा रहे हैं। उन्होंने सीमा को न सिर्फ खेल की तकनीकी बारीकियां सिखाईं, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी बेहद मजबूत बनाया। धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए सीमा ने अपनी पुरानी लय फिर से हासिल की और साल 2025 के राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर यह साफ संकेत दे दिया था कि वह वैश्विक मंच पर देश के लिए मेडल जीतने को पूरी तरह तैयार हैं।
एक थ्रो जिसने पलट दी बाजी
ग्लासगो में आयोजित इस खिताबी मुकाबले में सीमा की शुरुआत वैसी नहीं रही जैसी उन्होंने सोची थी। उनका पहला प्रयास फाउल हो गया। इसके बाद दूसरे प्रयास में उन्होंने 57.32 मीटर का थ्रो फेंका, लेकिन असली करिश्मा तीसरे प्रयास में हुआ जब उन्होंने 58.65 मीटर की शानदार दूरी तय करते हुए कांस्य पदक पर अपना मजबूत दावा ठोक दिया।
इसके बाद के चौथे, पांचवें और छठे प्रयास में वह फाउल कर बैठीं और सब कुछ अन्य खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर निर्भर हो गया। वह आखिरी पल बेहद तनाव से भरे थे, लेकिन अंततः वही 58.65 मीटर का एक थ्रो उन्हें जीत के पोडियम तक ले जाने में कामयाब रहा।
सिर्फ एक पदक नहीं, एक मिसाल है यह जीत
इस महिला चक्का फेंक के फाइनल मुकाबले में भारत की एक अन्य प्रतिभावान खिलाड़ी निधि रानी भी पदक की प्रबल दावेदार थीं, लेकिन वह 57.10 मीटर के थ्रो के साथ चौथे स्थान पर रहीं। इस स्पर्धा का स्वर्ण पदक जमैका की समांथा हॉल (61.66 मीटर) ने और रजत पदक कनाडा की जूलिया टंक्स (60.67 मीटर) ने अपने नाम किया।
सीमा का यह कांस्य पदक महज मेटल नहीं है, बल्कि देश की उन तमाम महिलाओं और माताओं के लिए एक मजबूत संदेश है जो यह मानती हैं कि विवाह, मातृत्व या पारिवारिक जिम्मेदारियों के बाद सपने अधूरे रह जाते हैं। उन्होंने साबित कर दिखाया कि अगर बुलंद हौसला और पक्का इरादा हो, तो जीवन की नई जिम्मेदारियां भी आपको अपनी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकतीं।


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