शिवपुरी| मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में 111 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार की गई सीवेज लाइन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) परियोजना में सामने आई गंभीर अनियमितताओं के मामले पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में दो टूक कहा है कि आम जनता के खून-पसीने की कमाई यानी टैक्स के पैसे की इस तरह की बर्बादी और शहर के नागरिकों को दूषित पेयजल आपूर्ति करना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने राज्य शासन को इस पूरे प्रकरण को पूरी गंभीरता से लेने के निर्देश दिए हैं।

अदालत की दो टूक: मामले को दबाने का प्रयास नहीं होना चाहिए

सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि इस संवेदनशील मामले को दबाने या रफा-दफा करने का कोई भी प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उच्च स्तरीय जाँच में वन भूमि या वन्यजीव अपराध (वन अपराध) से जुड़ी संलिप्तता सामने आती है, तो संबंधित दोषी अधिकारियों के विरुद्ध वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट) के तहत तुरंत एफआईआर दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने एक बार फिर दोहराया कि कानून से ऊपर कोई भी सरकारी अधिकारी नहीं हो सकता।

शुद्ध पेयजल की आपूर्ति और पर्यावरण संरक्षण सर्वोपरि

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उनकी अदालत का मुख्य उद्देश्य केवल प्रशासनिक अधिकारियों को तलब करना भर नहीं है, बल्कि शिवपुरी के आम नागरिकों को स्वच्छ और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना, जनता के धन का दुरुपयोग रोकना तथा पर्यावरण को पहुँच रहे नुकसान पर तत्काल रोक लगाना है। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि जनहित से जुड़े ऐसे गंभीर मामलों में किसी भी प्रकार की कोताही या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

एसीएस संजय दुबे को व्यक्तिगत पेशी से मिली छूट

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) संजय दुबे की ओर से व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने से छूट देने का अनुरोध करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसे उच्च न्यायालय ने कुछ आवश्यक शर्तों के साथ स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय (PHE) विभाग के स्थानीय अधिकारियों को इस मामले में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से दूर रहने और जाँच की पारदर्शिता व निष्पक्षता हर हाल में बनाए रखने के सख्त निर्देश दिए गए।

सांख्य सागर झील में सीवेज डंपिंग पर न्यायालय की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान माधव नेशनल पार्क के उप निदेशक (डिप्टी डायरेक्टर) हरिओम ने कोर्ट को वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए बताया कि प्रसिद्ध सांख्य सागर झील में आज भी सीवेज और गंदे कचरे की डंपिंग अनवरत जारी है। इस गंभीर लापरवाही के मामले में पीएचई विभाग के पूर्ववर्ती तथा वर्तमान अधिकारियों के साथ-साथ नगर पालिका परिषद के जिम्मेदार अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है। अदालत ने कड़े निर्देश दिए हैं कि इस पूरे प्रकरण की जाँच बिना किसी राजनैतिक या प्रशासनिक दबाव के पूरी निष्पक्षता से की जाए। साथ ही न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि यदि जाँच प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर ढिलाई बरती गई, तो इस संपूर्ण मामले को किसी केंद्रीय जाँच एजेंसी को सौंप दिया जाएगा।

पर्यावरण नियोजन संगठन की तत्कालीन निदेशक पर लगाया गया जुर्माना

उच्च न्यायालय ने इस अधूरे और दोषपूर्ण सीवेज प्रोजेक्ट को पहले ही मंजूरी दिए जाने पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (EPCO) की तत्कालीन पर्यावरण निदेशक अलका उपाध्याय द्वारा दाखिल किए गए जवाब को भ्रामक और असंतोषजनक मानते हुए अदालत ने उन पर 20 हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया है। न्यायालय ने उन्हें दो सप्ताह के भीतर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि जब शहर के घरों के सीवेज कनेक्शन मुख्य पाइपलाइन से जोड़े ही नहीं गए थे, तो किस आधार पर इस प्लांट को पूर्ण रूप से चालू मान लिया गया था। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर जुर्माना राशि जमा न करने की स्थिति में उनके विरुद्ध अवमानना (Contempt of Court) की सख्त कार्रवाई की जाएगी।